क्या आपके ज़हन में ये बात दौड़ रही है कि उस बैंक का क्या भविष्य है जिसके पास आपकी उम्र भर की कमाई है?
करोड़ों भारतीयों की तरह क्या आप ने भी हमेशा से ज़्यादा भरोसा सरकारी बैंकों पर किया है?
अगर आपकी बैंकिंग बैंक ऑफ़ बड़ौदा, विजया बैंक या देना बैंक से होती है तो ये ख़बर आपके लिए है.
अगर किसी और सरकारी बैंक से होती है तो भी ये ख़बर आपके लिए है क्योंकि कल को सरकार आपका बैंक बदलने का फ़ैसला भी ले सकती है.
साथ ही बताया गया है कि विलय से बनने वाला बैंक, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया और पंजाब नेशनल बैंक के बाद भारत का तीसरा सबसे बड़ा बैंक होगा.
फ़ैसला मामूली भी नहीं है. तीनों को मिलकर बनने वाले नए बैंक में कुल कर्मचारियों की संख्या 85,000 से ज़्यादा होगी और इस नए बैंक के पास देश-विदेश में कुल 9,485 शाखाएं हो जाएंगी.
सरकार ने बैंक ऑफ़ बड़ौदा, देना बैंक और विजया बैंक के विलय की घोषणा की है.
न रमणी के मुताबिक़, "विजया बैंक और देना बैंक में सरकार का ख़ासा कैपिटल जाता है जो विलय के बाद कम हो जाएगा. ये भी सच है कि देना बैंक के फंसे हुए ऋण या क़र्ज़ (एनपीए) का प्रतिशत बैंक ऑफ़ बड़ौदा और विजया बैंक के कुल एनपीए से भी ज़्यादा है जो बड़ी चिंता की बात है. लेकिन सरकार बैंक को ख़त्म होने के लिए छोड़ भी नहीं सकती. मुझे लगता है इस क़दम के बाद कई दूसरे बैंकों के विलय का रास्ता भी साफ़ हो गया है."
हालांकि इस बात की घोषणा नहीं की गई है कि नए बैंक का नाम क्या होगा, लेकिन इसी सरकार के पिछले फ़ैसले को ध्यान में रखते हुए कई जानकारों को लगता है कि बैंक ऑफ़ बड़ौदा की ब्रैंड वैल्यू बड़ी है और नाम वही रहेगा.
रहा सवाल ग्राहकों के मौजूदा कौतूहल का तो विश्लेषकों के मुताबिक़, "आखिरकार सरकार ने कुछ दिन पहले स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के सहयोगी बैंकों का विलय एसबीआई में किया था और सब कुछ ठीक ही चल रहा है."
यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया के पूर्व चेयरमैन अरुण तिवारी को लगता है "बैंक कस्टमर को परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है."
उन्होंने कहा, "पिछले 40-50 साल में कम से कम पांच बैंकों का विलय बैंक ऑफ़ बड़ौदा में हो चुका है. चाहे जमाकर्ता हों या ऋण लेने वाले, किसी में न तो कमी आई है और न शिकायत मिली है."
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